मिर्ज़ापुर अष्टभुजा पहाड़ी पर भगवान भरोसे झूलता यात्री झूला

मिर्ज़ापुर को पर्यटन की दृष्टि से बेहतर बनाने के लिए कई सारे प्रयास किये जाने की बातें राजनीतिक गलियारों से होती हुई जनता के कानों में भी पड़ती है। लेकिन जनता की आँखों को ऐसा होता कुछ नज़र नही आने से परियोजनाओं और योजनाओं के झुनझुने का मोहपाश टूटता प्रतीत हो रहा है।

साल 2017 में उत्तर प्रदेश में सरकार बदलने के साथ ही एक नए राजनैतिक दांव का शुरुआत हुई जिसमें प्रदेश भर में पूरे हुए निर्माण कार्यो पर अपने नाम का मुहर लगवाने के लिए मौजूदा व पूर्व सरकार आमने-सामने होती रही। आलम ये रहा कि एक लखनऊ मैट्रो का उद्घाटन 3-4 बार किया गया। अपने जनपद में भी चुनार व भटौली पुल का लोकार्पण सपा व भाजपा की ओर से अलग-अलग कर के पुल निर्माण में अपना पसीना बताने का होड़ किया गया था।

ऐसी ही एक और योजना है अष्टभुजा पहाड़ी रोपवे, जो समाजवादी पार्टी वालों के मुताबिक अखिलेश यादव ( पूर्व मुख्यमंत्री) का ड्रीम प्रोजेक्ट था वहीं भाजपा सरकार में इसके समापन के साथ ही इस पर कमल का मुहर लगने के आसार दिख रहे हैं और इस मामले में चट्टी चौराहो पर आमजन में बहस सुनी जा सकती हैं पर जब चर्चा उक़्त योजना के उपयोगिता पर की जाए तो दोनो ही तरफ के लोग कन्नी काटते मिल जाते हैं।

सड़क से अष्टभुजा मन्दिर और काली खोह से अष्टभुजा पहाड़ी तक की चढ़ाई लगभग 130 सीढ़ीयों मात्र की हैं और जहाँ से ट्राली/केबिन को चढ़ाया जाएगा और जहाँ ट्रॉली/केबिन को उतारा जाएगा वो दोनो ही छोर पर पूरे साल बड़े सुलभता से वाहन से पहुँचा जा सकता हैं तो इस परियोजना की उपयोगिता पर सवाल उठना लाजिम हैं। पूर्व से मौजूद रिपोर्ट्स की माने तो उक़्त परियोजना के लिए लगभग 14 करोड़ का बजट दिया जाना था जिसमें थीम पार्क व अष्टभुजा तलाब में बोटिंग की भी योजना रखी गयी थी। जिस पर किसी भी तरह का कार्य होता फिलहाल नहीं दिख रहा हैं।

लंबे दौड़ पर इस परियोजना पर चर्चा किया जाए तो ये कार्य लोकहित में उतना भी नहीं दिखती जितना इस पर खर्च किया जाना तय किया गया हैं। वैसे लोगो का ये भी मानना हैं की इस परियोजना के अलावा एयर एम्बुलेंस कि सुविधा जिसकी सुगबुगाहट मौजूदा सरकार के शुरूआती दिनों में थी,पर कार्य किया जाता तो तुलनात्मक ढंग से अधिक फायदेमंद और लोकहित में होता।

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